Book 5 • Chapter 15
Section 15
12 verses
Verse 1
कहेउ राम बियोग तव सीता मो कहुँ सकल भए बिपरीता
Verse 2
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू कालनिसा सम निसि ससि भानू
Verse 3
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा बारिद तपत तेल जनु बरिसा
Verse 4
जे हित रहे करत तेइ पीरा उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा
Verse 5
कहेहू तें कछु दुख घटि होई काहि कहौं यह जान न कोई
Verse 6
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा जानत प्रिया एकु मनु मोरा
Verse 7
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं
Verse 8
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही
Verse 9
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता सुमिरु राम सेवक सुखदाता
Verse 10
उर आनहु रघुपति प्रभुताई सुनि मम बचन तजहु कदराई
Verse 11
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु
Verse 12
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु
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