Book 5 • Chapter 14
Section 14
12 verses
Verse 1
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी
Verse 2
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना भयउ तात मों कहुँ जलजाना
Verse 3
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी अनुज सहित सुख भवन खरारी
Verse 4
कोमलचित कृपाल रघुराई कपि केहि हेतु धरी निठुराई
Verse 5
सहज बानि सेवक सुख दायक कबहुँक सुरति करत रघुनायक
Verse 6
कबहुँ नयन मम सीतल ताता होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता
Verse 7
बचनु न आव नयन भरे बारी अहह नाथ हौं निपट बिसारी
Verse 8
देखि परम बिरहाकुल सीता बोला कपि मृदु बचन बिनीता
Verse 9
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता तव दुख दुखी सुकृपा निकेता
Verse 10
जनि जननी मानहु जियँ ऊना तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना
Verse 11
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर
Verse 12
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर
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