Book 5 • Chapter 13
Section 13
13 verses
Verse 1
तब देखी मुद्रिका मनोहर राम नाम अंकित अति सुंदर
Verse 2
चकित चितव मुदरी पहिचानी हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी
Verse 3
जीति को सकइ अजय रघुराई माया तें असि रचि नहिं जाई
Verse 4
सीता मन बिचार कर नाना मधुर बचन बोलेउ हनुमाना
Verse 5
रामचंद्र गुन बरनैं लागा सुनतहिं सीता कर दुख भागा
Verse 6
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई आदिहु तें सब कथा सुनाई
Verse 7
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई कहि सो प्रगट होति किन भाई
Verse 8
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ
Verse 9
राम दूत मैं मातु जानकी सत्य सपथ करुनानिधान की
Verse 10
यह मुद्रिका मातु मैं आनी दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी
Verse 11
नर बानरहि संग कहु कैसें कहि कथा भइ संगति जैसें
Verse 12
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
Verse 13
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास
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