Book 5 • Chapter 12
Section 12
14 verses
Verse 1
त्रिजटा सन बोली कर जोरी मातु बिपति संगिनि तैं मोरी
Verse 2
तजौं देह करु बेगि उपाई दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई
Verse 3
आनि काठ रचु चिता बनाई मातु अनल पुनि देहि लगाई
Verse 4
सत्य करहि मम प्रीति सयानी सुनै को श्रवन सूल सम बानी
Verse 5
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि
Verse 6
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी अस कहि सो निज भवन सिधारी
Verse 7
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला मिलहि न पावक मिटिहि न सूला
Verse 8
देखिअत प्रगट गगन अंगारा अवनि न आवत एकउ तारा
Verse 9
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी मानहुँ मोहि जानि हतभागी
Verse 10
सुनहि बिनय मम बिटप असोका सत्य नाम करु हरु मम सोका
Verse 11
नूतन किसलय अनल समाना देहि अगिनि जनि करहि निदाना
Verse 12
देखि परम बिरहाकुल सीता सो छन कपिहि कलप सम बीता
Verse 13
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब
Verse 14
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ
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