Book 5 • Chapter 11
Section 11
10 verses
Verse 1
त्रिजटा नाम राच्छसी एका राम चरन रति निपुन बिबेका
Verse 2
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना सीतहि सेइ करहु हित अपना
Verse 3
सपनें बानर लंका जारी जातुधान सेना सब मारी
Verse 4
खर आरूढ़ नगन दससीसा मुंडित सिर खंडित भुज बीसा
Verse 5
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई लंका मनहुँ बिभीषन पाई
Verse 6
नगर फिरी रघुबीर दोहाई तब प्रभु सीता बोलि पठाई
Verse 7
यह सपना में कहउँ पुकारी होइहि सत्य गएँ दिन चारी
Verse 8
तासु बचन सुनि ते सब डरीं जनकसुता के चरनन्हि परीं
Verse 9
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच
Verse 10
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच
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