Book 5 • Chapter 20
Section 20
10 verses
Verse 1
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा परतिहुँ बार कटकु संघारा
Verse 2
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ नागपास बाँधेसि लै गयऊ
Verse 3
जासु नाम जपि सुनहु भवानी भव बंधन काटहिं नर ग्यानी
Verse 4
तासु दूत कि बंध तरु आवा प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा
Verse 5
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए कौतुक लागि सभाँ सब आए
Verse 6
दसमुख सभा दीखि कपि जाई कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई
Verse 7
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता भृकुटि बिलोकत सकल सभीता
Verse 8
देखि प्रताप न कपि मन संका जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका
Verse 9
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद
Verse 10
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद
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