Book 5 • Chapter 21
Section 21
11 verses
Verse 1
कह लंकेस कवन तैं कीसा केहिं के बल घालेहि बन खीसा
Verse 2
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही देखउँ अति असंक सठ तोही
Verse 3
मारे निसिचर केहिं अपराधा कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा
Verse 4
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया पाइ जासु बल बिरचित माया
Verse 5
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा पालत सृजत हरत दससीसा
Verse 6
जा बल सीस धरत सहसानन अंडकोस समेत गिरि कानन
Verse 7
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता
Verse 8
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा तेहि समेत नृप दल मद गंजा
Verse 9
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली बधे सकल अतुलित बलसाली
Verse 10
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि
Verse 11
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि
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