Book 5 • Chapter 24
Section 24
11 verses
Verse 1
जदपि कहि कपि अति हित बानी भगति बिबेक बिरति नय सानी
Verse 2
बोला बिहसि महा अभिमानी मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी
Verse 3
मृत्यु निकट आई खल तोही लागेसि अधम सिखावन मोही
Verse 4
उलटा होइहि कह हनुमाना मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना
Verse 5
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना
Verse 6
सुनत निसाचर मारन धाए सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए
Verse 7
नाइ सीस करि बिनय बहूता नीति बिरोध न मारिअ दूता
Verse 8
आन दंड कछु करिअ गोसाँई सबहीं कहा मंत्र भल भाई
Verse 9
सुनत बिहसि बोला दसकंधर अंग भंग करि पठइअ बंदर
Verse 10
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ
Verse 11
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ
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