Book 5 • Chapter 26
Section 26
10 verses
Verse 1
देह बिसाल परम हरुआई मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई
Verse 2
जरइ नगर भा लोग बिहाला झपट लपट बहु कोटि कराला
Verse 3
तात मातु हा सुनिअ पुकारा एहि अवसर को हमहि उबारा
Verse 4
हम जो कहा यह कपि नहिं होई बानर रूप धरें सुर कोई
Verse 5
साधु अवग्या कर फलु ऐसा जरइ नगर अनाथ कर जैसा
Verse 6
जारा नगरु निमिष एक माहीं एक बिभीषन कर गृह नाहीं
Verse 7
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा जरा न सो तेहि कारन गिरिजा
Verse 8
उलटि पलटि लंका सब जारी कूदि परा पुनि सिंधु मझारी
Verse 9
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि
Verse 10
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि
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