Book 5 • Chapter 3
Section 3
25 verses
Verse 1
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई करि माया नभु के खग गहई
Verse 2
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं
Verse 3
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई एहि बिधि सदा गगनचर खाई
Verse 4
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा
Verse 5
ताहि मारि मारुतसुत बीरा बारिधि पार गयउ मतिधीरा
Verse 6
तहाँ जाइ देखी बन सोभा गुंजत चंचरीक मधु लोभा
Verse 7
नाना तरु फल फूल सुहाए खग मृग बृंद देखि मन भाए
Verse 8
सैल बिसाल देखि एक आगें ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें
Verse 9
उमा न कछु कपि कै अधिकाई प्रभु प्रताप जो कालहि खाई
Verse 10
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी
Verse 11
अति उतंग जलनिधि चहु पासा कनक कोट कर परम प्रकासा
Verse 12
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना
Verse 13
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना
Verse 14
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै
Verse 15
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै
Verse 16
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं
Verse 17
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं
Verse 18
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं
Verse 19
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं
Verse 20
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं
Verse 21
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं
Verse 22
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही
Verse 23
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही
Verse 24
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार
Verse 25
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार
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