Book 5 • Chapter 36
Section 36
12 verses
Verse 1
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका जब ते जारि गयउ कपि लंका
Verse 2
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा नहिं निसिचर कुल केर उबारा
Verse 3
जासु दूत बल बरनि न जाई तेहि आएँ पुर कवन भलाई
Verse 4
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी मंदोदरी अधिक अकुलानी
Verse 5
रहसि जोरि कर पति पग लागी बोली बचन नीति रस पागी
Verse 6
कंत करष हरि सन परिहरहू मोर कहा अति हित हियँ धरहु
Verse 7
समुझत जासु दूत कइ करनी स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी
Verse 8
तासु नारि निज सचिव बोलाई पठवहु कंत जो चहहु भलाई
Verse 9
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई सीता सीत निसा सम आई
Verse 10
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें
Verse 11
-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक
Verse 12
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक
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