Book 5 • Chapter 40
Section 40
10 verses
Verse 1
माल्यवंत अति सचिव सयाना तासु बचन सुनि अति सुख माना
Verse 2
तात अनुज तव नीति बिभूषन सो उर धरहु जो कहत बिभीषन
Verse 3
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ
Verse 4
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी
Verse 5
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं नाथ पुरान निगम अस कहहीं
Verse 6
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना
Verse 7
तव उर कुमति बसी बिपरीता हित अनहित मानहु रिपु प्रीता
Verse 8
कालराति निसिचर कुल केरी तेहि सीता पर प्रीति घनेरी
Verse 9
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार
Verse 10
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार
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