Book 5 • Chapter 43
Section 43
11 verses
Verse 1
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा
Verse 2
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा
Verse 3
ताहि राखि कपीस पहिं आए समाचार सब ताहि सुनाए
Verse 4
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई आवा मिलन दसानन भाई
Verse 5
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा कहइ कपीस सुनहु नरनाहा
Verse 6
जानि न जाइ निसाचर माया कामरूप केहि कारन आया
Verse 7
भेद हमार लेन सठ आवा राखिअ बाँधि मोहि अस भावा
Verse 8
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी मम पन सरनागत भयहारी
Verse 9
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना सरनागत बच्छल भगवाना
Verse 10
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि
Verse 11
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि
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