Book 5 • Chapter 44
Section 44
10 verses
Verse 1
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू
Verse 2
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं
Verse 3
पापवंत कर सहज सुभाऊ भजनु मोर तेहि भाव न काऊ
Verse 4
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई मोरें सनमुख आव कि सोई
Verse 5
निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा
Verse 6
भेद लेन पठवा दससीसा तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा
Verse 7
जग महुँ सखा निसाचर जेते लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते
Verse 8
जौं सभीत आवा सरनाई रखिहउँ ताहि प्रान की नाई
Verse 9
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत
Verse 10
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत
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