Book 5 • Chapter 46
Section 46
10 verses
Verse 1
अस कहि करत दंडवत देखा तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा
Verse 2
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा
Verse 3
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी बोले बचन भगत भयहारी
Verse 4
कहु लंकेस सहित परिवारा कुसल कुठाहर बास तुम्हारा
Verse 5
खल मंडलीं बसहु दिनु राती सखा धरम निबहइ केहि भाँती
Verse 6
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती अति नय निपुन न भाव अनीती
Verse 7
बरु भल बास नरक कर ताता दुष्ट संग जनि देइ बिधाता
Verse 8
अब पद देखि कुसल रघुराया जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया
Verse 9
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम
Verse 10
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम
0:000:00
Speed: