Book 5 • Chapter 47
Section 47
10 verses
Verse 1
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना लोभ मोह मच्छर मद माना
Verse 2
जब लगि उर न बसत रघुनाथा धरें चाप सायक कटि भाथा
Verse 3
ममता तरुन तमी अँधिआरी राग द्वेष उलूक सुखकारी
Verse 4
तब लगि बसति जीव मन माहीं जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं
Verse 5
अब मैं कुसल मिटे भय भारे देखि राम पद कमल तुम्हारे
Verse 6
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला
Verse 7
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ
Verse 8
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा
Verse 9
-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज
Verse 10
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज
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