Book 5 • Chapter 48
Section 48
10 verses
Verse 1
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ
Verse 2
जौं नर होइ चराचर द्रोही आवे सभय सरन तकि मोही
Verse 3
तजि मद मोह कपट छल नाना करउँ सद्य तेहि साधु समाना
Verse 4
जननी जनक बंधु सुत दारा तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा
Verse 5
सब कै ममता ताग बटोरी मम पद मनहि बाँध बरि डोरी
Verse 6
समदरसी इच्छा कछु नाहीं हरष सोक भय नहिं मन माहीं
Verse 7
अस सज्जन मम उर बस कैसें लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें
Verse 8
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें धरउँ देह नहिं आन निहोरें
Verse 9
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम
Verse 10
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम
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