Book 5 • Chapter 49
Section 49
14 verses
Verse 1
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें
Verse 2
राम बचन सुनि बानर जूथा सकल कहहिं जय कृपा बरूथा
Verse 3
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी नहिं अघात श्रवनामृत जानी
Verse 4
पद अंबुज गहि बारहिं बारा हृदयँ समात न प्रेमु अपारा
Verse 5
सुनहु देव सचराचर स्वामी प्रनतपाल उर अंतरजामी
Verse 6
उर कछु प्रथम बासना रही प्रभु पद प्रीति सरित सो बही
Verse 7
अब कृपाल निज भगति पावनी देहु सदा सिव मन भावनी
Verse 8
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा मागा तुरत सिंधु कर नीरा
Verse 9
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं मोर दरसु अमोघ जग माहीं
Verse 10
अस कहि राम तिलक तेहि सारा सुमन बृष्टि नभ भई अपारा
Verse 11
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड
Verse 12
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड 49(क)
Verse 13
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ
Verse 14
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ 49(ख)
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