Book 5 • Chapter 50
Section 50
10 verses
Verse 1
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना
Verse 2
निज जन जानि ताहि अपनावा प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा
Verse 3
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी सर्बरूप सब रहित उदासी
Verse 4
बोले बचन नीति प्रतिपालक कारन मनुज दनुज कुल घालक
Verse 5
सुनु कपीस लंकापति बीरा केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा
Verse 6
संकुल मकर उरग झष जाती अति अगाध दुस्तर सब भाँती
Verse 7
कह लंकेस सुनहु रघुनायक कोटि सिंधु सोषक तव सायक
Verse 8
जद्यपि तदपि नीति असि गाई बिनय करिअ सागर सन जाई
Verse 9
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि
Verse 10
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि
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