Book 5 • Chapter 51
Section 51
10 verses
Verse 1
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई करिअ दैव जौं होइ सहाई
Verse 2
मंत्र न यह लछिमन मन भावा राम बचन सुनि अति दुख पावा
Verse 3
नाथ दैव कर कवन भरोसा सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा
Verse 4
कादर मन कहुँ एक अधारा दैव दैव आलसी पुकारा
Verse 5
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा
Verse 6
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई सिंधु समीप गए रघुराई
Verse 7
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई बैठे पुनि तट दर्भ डसाई
Verse 8
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए पाछें रावन दूत पठाए
Verse 9
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह
Verse 10
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह
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