Book 5 • Chapter 6
Section 6
10 verses
Verse 1
लंका निसिचर निकर निवासा इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा
Verse 2
मन महुँ तरक करै कपि लागा तेहीं समय बिभीषनु जागा
Verse 3
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा
Verse 4
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी साधु ते होइ न कारज हानी
Verse 5
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए सुनत बिभीषण उठि तहँ आए
Verse 6
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई बिप्र कहहु निज कथा बुझाई
Verse 7
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई मोरें हृदय प्रीति अति होई
Verse 8
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी आयहु मोहि करन बड़भागी
Verse 9
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम
Verse 10
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम
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