Book 5 • Chapter 7
Section 7
10 verses
Verse 1
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी
Verse 2
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा
Verse 3
तामस तनु कछु साधन नाहीं प्रीति न पद सरोज मन माहीं
Verse 4
अब मोहि भा भरोस हनुमंता बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता
Verse 5
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा
Verse 6
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती करहिं सदा सेवक पर प्रीती
Verse 7
कहहु कवन मैं परम कुलीना कपि चंचल सबहीं बिधि हीना
Verse 8
प्रात लेइ जो नाम हमारा तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा
Verse 9
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर
Verse 10
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर
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