Book 5 • Chapter 8
Section 8
10 verses
Verse 1
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी
Verse 2
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा
Verse 3
पुनि सब कथा बिभीषन कही जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही
Verse 4
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता देखी चहउँ जानकी माता
Verse 5
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई चलेउ पवनसुत बिदा कराई
Verse 6
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ बन असोक सीता रह जहवाँ
Verse 7
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा बैठेहिं बीति जात निसि जामा
Verse 8
कृस तन सीस जटा एक बेनी जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी
Verse 9
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन
Verse 10
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन
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