Book 5 • Chapter 60
Section 60
14 verses
Verse 1
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई लरिकाई रिषि आसिष पाई
Verse 2
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे
Verse 3
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई करिहउँ बल अनुमान सहाई
Verse 4
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ
Verse 5
एहि सर मम उत्तर तट बासी हतहु नाथ खल नर अघ रासी
Verse 6
सुनि कृपाल सागर मन पीरा तुरतहिं हरी राम रनधीरा
Verse 7
देखि राम बल पौरुष भारी हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी
Verse 8
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा चरन बंदि पाथोधि सिधावा
Verse 9
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ
Verse 10
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ
Verse 11
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना
Verse 12
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना
Verse 13
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान
Verse 14
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान
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