Book 5 • Chapter 59
Section 59
10 verses
Verse 1
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे छमहु नाथ सब अवगुन मेरे
Verse 2
गगन समीर अनल जल धरनी इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी
Verse 3
तव प्रेरित मायाँ उपजाए सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए
Verse 4
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई सो तेहि भाँति रहे सुख लहई
Verse 5
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही
Verse 6
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी
Verse 7
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई
Verse 8
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई
Verse 9
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ
Verse 10
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ
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