Book 5 • Chapter 58
Section 58
10 verses
Verse 1
लछिमन बान सरासन आनू सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू
Verse 2
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती सहज कृपन सन सुंदर नीती
Verse 3
ममता रत सन ग्यान कहानी अति लोभी सन बिरति बखानी
Verse 4
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा ऊसर बीज बएँ फल जथा
Verse 5
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा यह मत लछिमन के मन भावा
Verse 6
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला उठी उदधि उर अंतर ज्वाला
Verse 7
मकर उरग झष गन अकुलाने जरत जंतु जलनिधि जब जाने
Verse 8
कनक थार भरि मनि गन नाना बिप्र रूप आयउ तजि माना
Verse 9
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच
Verse 10
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच
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