Book 5 • Chapter 57
Section 57
14 verses
Verse 1
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई कहत दसानन सबहि सुनाई
Verse 2
भूमि परा कर गहत अकासा लघु तापस कर बाग बिलासा
Verse 3
कह सुक नाथ सत्य सब बानी समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी
Verse 4
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा नाथ राम सन तजहु बिरोधा
Verse 5
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ जद्यपि अखिल लोक कर राऊ
Verse 6
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही उर अपराध न एकउ धरिही
Verse 7
जनकसुता रघुनाथहि दीजे एतना कहा मोर प्रभु कीजे
Verse 8
जब तेहिं कहा देन बैदेही चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही
Verse 9
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ कृपासिंधु रघुनायक जहाँ
Verse 10
करि प्रनामु निज कथा सुनाई राम कृपाँ आपनि गति पाई
Verse 11
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी
Verse 12
बंदि राम पद बारहिं बारा मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा
Verse 13
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति
Verse 14
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति
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