Book 5 • Chapter 56
Section 56
14 verses
Verse 1
राम तेज बल बुधि बिपुलाई सेष सहस सत सकहिं न गाई
Verse 2
सक सर एक सोषि सत सागर तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर
Verse 3
तासु बचन सुनि सागर पाहीं मागत पंथ कृपा मन माहीं
Verse 4
सुनत बचन बिहसा दससीसा जौं असि मति सहाय कृत कीसा
Verse 5
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई सागर सन ठानी मचलाई
Verse 6
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई
Verse 7
सचिव सभीत बिभीषन जाकें बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें
Verse 8
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी समय बिचारि पत्रिका काढ़ी
Verse 9
रामानुज दीन्ही यह पाती नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती
Verse 10
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन सचिव बोलि सठ लाग बचावन
Verse 11
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस
Verse 12
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस 56(क)
Verse 13
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग
Verse 14
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग 56(ख)
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