Book 7 • Chapter 100
Section 100
10 verses
Verse 1
पर त्रिय लंपट कपट सयाने मोह द्रोह ममता लपटाने
Verse 2
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर देखा में चरित्र कलिजुग कर
Verse 3
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं
Verse 4
कल्प कल्प भरि एक एक नरका परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका
Verse 5
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा स्वपच किरात कोल कलवारा
Verse 6
नारि मुई गृह संपति नासी मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी
Verse 7
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं उभय लोक निज हाथ नसावहिं
Verse 8
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी निराचार सठ बृषली स्वामी
Verse 9
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना बैठि बरासन कहहिं पुराना
Verse 10
सब नर कल्पित करहिं अचारा जाइ न बरनि अनीति अपारा
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