Book 7 • Chapter 101
Section 101
10 verses
Verse 1
बहु दाम सँवारहिं धाम जती बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती
Verse 2
तपसी धनवंत दरिद्र गृही कलि कौतुक तात न जात कही
Verse 3
कुलवंति निकारहिं नारि सती गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती
Verse 4
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं अबलानन दीख नहीं जब लौं
Verse 5
ससुरारि पिआरि लगी जब तें रिपरूप कुटुंब भए तब तें
Verse 6
नृप पाप परायन धर्म नहीं करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं
Verse 7
धनवंत कुलीन मलीन अपी द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी
Verse 8
नहिं मान पुरान न बेदहि जो हरि सेवक संत सही कलि सो
Verse 9
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी
Verse 10
कलि बारहिं बार दुकाल परै बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै
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