Book 7 • Chapter 106
Section 106
16 verses
Verse 1
एक बार गुर लीन्ह बोलाई मोहि नीति बहु भाँति सिखाई
Verse 2
सिव सेवा कर फल सुत सोई अबिरल भगति राम पद होई
Verse 3
रामहि भजहिं तात सिव धाता नर पावँर कै केतिक बाता
Verse 4
जासु चरन अज सिव अनुरागी तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी
Verse 5
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ
Verse 6
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ
Verse 7
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती
Verse 8
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा
Verse 9
जेहि ते नीच बड़ाई पावा सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा
Verse 10
धूम अनल संभव सुनु भाई तेहि बुझाव घन पदवी पाई
Verse 11
रज मग परी निरादर रहई सब कर पद प्रहार नित सहई
Verse 12
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई
Verse 13
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा बुध नहिं करहिं अधम कर संगा
Verse 14
कबि कोबिद गावहिं असि नीती खल सन कलह न भल नहिं प्रीती
Verse 15
उदासीन नित रहिअ गोसाईं खल परिहरिअ स्वान की नाईं
Verse 16
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई गुर हित कहइ न मोहि सोहाई
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