Book 7 • Chapter 107
Section 107
8 verses
Verse 1
मंदिर माझ भई नभ बानी रे हतभाग्य अग्य अभिमानी
Verse 2
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा अति कृपाल चित सम्यक बोधा
Verse 3
तदपि साप सठ दैहउँ तोही नीति बिरोध सोहाइ न मोही
Verse 4
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा
Verse 5
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं रौरव नरक कोटि जुग परहीं
Verse 6
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा
Verse 7
बैठ रहेसि अजगर इव पापी सर्प होहि खल मल मति ब्यापी
Verse 8
महा बिटप कोटर महुँ जाई रहु अधमाधम अधगति पाई
0:000:00
Speed: