Book 7 • Chapter 108
Section 108
26 verses
Verse 1
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं
Verse 2
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं
Verse 3
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं
Verse 4
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहं
Verse 5
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं
Verse 6
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा
Verse 7
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं
Verse 8
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि
Verse 9
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं
Verse 10
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं
Verse 11
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनान्ददाता पुरारी
Verse 12
चिदानंदसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी
Verse 13
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परे वा नराणां
Verse 14
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं
Verse 15
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं
Verse 16
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो
Verse 17
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
Verse 18
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति
Verse 19
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु
Verse 20
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु 108(क)
Verse 21
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु
Verse 22
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु 108(ख)
Verse 23
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान
Verse 24
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान 108(ग)
Verse 25
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल
Verse 26
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल 108(घ)
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