Book 7 • Chapter 11
Section 11
8 verses
Verse 1
अवधपुरी अति रुचिर बनाई देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई
Verse 2
राम कहा सेवकन्ह बुलाई प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई
Verse 3
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए
Verse 4
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे निज कर राम जटा निरुआरे
Verse 5
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई भगत बछल कृपाल रघुराई
Verse 6
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई सेष कोटि सत सकहिं न गाई
Verse 7
पुनि निज जटा राम बिबराए गुर अनुसासन मागि नहाए
Verse 8
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे अंग अनंग देखि सत लाजे
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