Book 7 • Chapter 10
Section 10
8 verses
Verse 1
प्रभु जानी कैकेई लजानी प्रथम तासु गृह गए भवानी
Verse 2
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा
Verse 3
कृपासिंधु जब मंदिर गए पुर नर नारि सुखी सब भए
Verse 4
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई आजु सुघरी सुदिन समुदाई
Verse 5
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन रामचंद्र बैठहिं सिंघासन
Verse 6
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए
Verse 7
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका जग अभिराम राम अभिषेका
Verse 8
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे महाराज कहँ तिलक करीजै
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