Book 7 • Chapter 128
Section 128
8 verses
Verse 1
मति अनुरूप कथा मैं भाषी जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी
Verse 2
तव मन प्रीति देखि अधिकाई तब मैं रघुपति कथा सुनाई
Verse 3
यह न कहिअ सठही हठसीलहि जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि
Verse 4
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि जो न भजइ सचराचर स्वामिहि
Verse 5
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ
Verse 6
राम कथा के तेइ अधिकारी जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी
Verse 7
गुर पद प्रीति नीति रत जेई द्विज सेवक अधिकारी तेई
Verse 8
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई
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