Book 7 • Chapter 43
Section 43
8 verses
Verse 1
एक बार रघुनाथ बोलाए गुर द्विज पुरबासी सब आए
Verse 2
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन बोले बचन भगत भव भंजन
Verse 3
सनहु सकल पुरजन मम बानी कहउँ न कछु ममता उर आनी
Verse 4
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई
Verse 5
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई मम अनुसासन मानै जोई
Verse 6
जौं अनीति कछु भाषौं भाई तौं मोहि बरजहु भय बिसराई
Verse 7
बड़ें भाग मानुष तनु पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा
Verse 8
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा पाइ न जेहिं परलोक सँवारा
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