Book 7 • Chapter 50
Section 50
9 verses
Verse 1
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए कृपासिंधु के मन अति भाए
Verse 2
हनूमान भरतादिक भ्राता संग लिए सेवक सुखदाता
Verse 3
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए गज रथ तुरग मगावत भए
Verse 4
देखि कृपा करि सकल सराहे दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे
Verse 5
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई गए जहाँ सीतल अवँराई
Verse 6
भरत दीन्ह निज बसन डसाई बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई
Verse 7
मारुतसुत तब मारूत करई पुलक बपुष लोचन जल भरई
Verse 8
हनूमान सम नहिं बड़भागी नहिं कोउ राम चरन अनुरागी
Verse 9
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई बार बार प्रभु निज मुख गाई
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