Book 7 • Chapter 57
Section 57
10 verses
Verse 1
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई तासु नास कल्पांत न होई
Verse 2
माया कृत गुन दोष अनेका मोह मनोज आदि अबिबेका
Verse 3
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं
Verse 4
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा सो सुनु उमा सहित अनुरागा
Verse 5
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई जाप जग्य पाकरि तर करई
Verse 6
आँब छाहँ कर मानस पूजा तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा
Verse 7
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा
Verse 8
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना प्रेम सहित कर सादर गाना
Verse 9
सुनहिं सकल मति बिमल मराला बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला
Verse 10
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा उर उपजा आनंद बिसेषा
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