Book 7 • Chapter 77
Section 77
10 verses
Verse 1
अरुन पानि नख करज मनोहर बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर
Verse 2
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा चारु चिबुक आनन छबि सींवा
Verse 3
कलबल बचन अधर अरुनारे दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे
Verse 4
ललित कपोल मनोहर नासा सकल सुखद ससि कर सम हासा
Verse 5
नील कंज लोचन भव मोचन भ्राजत भाल तिलक गोरोचन
Verse 6
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए कुंचित कच मेचक छबि छाए
Verse 7
पीत झीनि झगुली तन सोही किलकनि चितवनि भावति मोही
Verse 8
रूप रासि नृप अजिर बिहारी नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी
Verse 9
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा
Verse 10
किलकत मोहि धरन जब धावहिं चलउँ भागि तब पूप देखावहिं
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