Book 7 • Chapter 82
Section 82
8 verses
Verse 1
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका बीते मनहुँ कल्प सत एका
Verse 2
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ
Verse 3
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ
Verse 4
देखउँ जन्म महोत्सव जाई जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई
Verse 5
राम उदर देखेउँ जग नाना देखत बनइ न जाइ बखाना
Verse 6
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना माया पति कृपाल भगवाना
Verse 7
करउँ बिचार बहोरि बहोरी मोह कलिल ब्यापित मति मोरी
Verse 8
उभय घरी महँ मैं सब देखा भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा
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