Book 7 • Chapter 85
Section 85
8 verses
Verse 1
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक बोले बचन परम सुखदायक
Verse 2
सुनु बायस तैं सहज सयाना काहे न मागसि अस बरदाना
Verse 3
सब सुख खानि भगति तैं मागी नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी
Verse 4
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं जे जप जोग अनल तन दहहीं
Verse 5
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई मागेहु भगति मोहि अति भाई
Verse 6
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें
Verse 7
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा जोग चरित्र रहस्य बिभागा
Verse 8
जानब तैं सबही कर भेदा मम प्रसाद नहिं साधन खेदा
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