Book 7 • Chapter 93
Section 93
8 verses
Verse 1
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए हरषित खगपति पंख फुलाए
Verse 2
नयन नीर मन अति हरषाना श्रीरघुपति प्रताप उर आना
Verse 3
पाछिल मोह समुझि पछिताना ब्रह्म अनादि मनुज करि माना
Verse 4
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा जानि राम सम प्रेम बढ़ावा
Verse 5
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई जौं बिरंचि संकर सम होई
Verse 6
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता
Verse 7
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक मोहि जिआयउ जन सुखदायक
Verse 8
तव प्रसाद मम मोह नसाना राम रहस्य अनूपम जाना
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