Book 3 • Chapter 21
Section 21
15 verses
Verse 1
जब रघुनाथ समर रिपु जीते सुर नर मुनि सब के भय बीते
Verse 2
तब लछिमन सीतहि लै आए प्रभु पद परत हरषि उर लाए
Verse 3
सीता चितव स्याम मृदु गाता परम प्रेम लोचन न अघाता
Verse 4
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक करत चरित सुर मुनि सुखदायक
Verse 5
धुआँ देखि खरदूषन केरा जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा
Verse 6
बोलि बचन क्रोध करि भारी देस कोस कै सुरति बिसारी
Verse 7
करसि पान सोवसि दिनु राती सुधि नहिं तव सिर पर आराती
Verse 8
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा
Verse 9
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ
Verse 10
संग ते जती कुमंत्र ते राजा मान ते ग्यान पान तें लाजा
Verse 11
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी नासहि बेगि नीति अस सुनी
Verse 12
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि
Verse 13
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन 21(क)
Verse 14
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ
Verse 15
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ 21(ख)
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