Book 3 • Chapter 26
Section 26
8 verses
Verse 1
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी
Verse 2
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा कहु जग मोहि समान को जोधा
Verse 3
तब मारीच हृदयँ अनुमाना नवहि बिरोधें नहिं कल्याना
Verse 4
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी बैद बंदि कबि भानस गुनी
Verse 5
उभय भाँति देखा निज मरना तब ताकिसि रघुनायक सरना
Verse 6
उतरु देत मोहि बधब अभागें कस न मरौं रघुपति सर लागें
Verse 7
अस जियँ जानि दसानन संगा चला राम पद प्रेम अभंगा
Verse 8
मन अति हरष जनाव न तेही आजु देखिहउँ परम सनेही
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