Book 3 • Chapter 27
Section 27
19 verses
Verse 1
तेहि बन निकट दसानन गयऊ तब मारीच कपटमृग भयऊ
Verse 2
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई कनक देह मनि रचित बनाई
Verse 3
सीता परम रुचिर मृग देखा अंग अंग सुमनोहर बेषा
Verse 4
सुनहु देव रघुबीर कृपाला एहि मृग कर अति सुंदर छाला
Verse 5
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही आनहु चर्म कहति बैदेही
Verse 6
तब रघुपति जानत सब कारन उठे हरषि सुर काजु सँवारन
Verse 7
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा करतल चाप रुचिर सर साँधा
Verse 8
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई
Verse 9
सीता केरि करेहु रखवारी बुधि बिबेक बल समय बिचारी
Verse 10
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी धाए रामु सरासन साजी
Verse 11
निगम नेति सिव ध्यान न पावा मायामृग पाछें सो धावा
Verse 12
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई
Verse 13
प्रगटत दुरत करत छल भूरी एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी
Verse 14
तब तकि राम कठिन सर मारा धरनि परेउ करि घोर पुकारा
Verse 15
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा
Verse 16
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा सुमिरेसि रामु समेत सनेहा
Verse 17
अंतर प्रेम तासु पहिचाना मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना
Verse 18
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ
Verse 19
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ
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