Book 3 • Chapter 28
Section 28
18 verses
Verse 1
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा सोह चाप कर कटि तूनीरा
Verse 2
आरत गिरा सुनी जब सीता कह लछिमन सन परम सभीता
Verse 3
जाहु बेगि संकट अति भ्राता लछिमन बिहसि कहा सुनु माता
Verse 4
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई सपनेहुँ संकट परइ कि सोई
Verse 5
मरम बचन जब सीता बोला हरि प्रेरित लछिमन मन डोला
Verse 6
बन दिसि देव सौंपि सब काहू चले जहाँ रावन ससि राहू
Verse 7
सून बीच दसकंधर देखा आवा निकट जती कें बेषा
Verse 8
जाकें डर सुर असुर डेराहीं निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं
Verse 9
सो दससीस स्वान की नाई इत उत चितइ चला भड़िहाई
Verse 10
इमि कुपंथ पग देत खगेसा रह न तेज बुधि बल लेसा
Verse 11
नाना बिधि करि कथा सुहाई राजनीति भय प्रीति देखाई
Verse 12
कह सीता सुनु जती गोसाईं बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं
Verse 13
तब रावन निज रूप देखावा भई सभय जब नाम सुनावा
Verse 14
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा
Verse 15
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा भएसि कालबस निसिचर नाहा
Verse 16
सुनत बचन दससीस रिसाना मन महुँ चरन बंदि सुख माना
Verse 17
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ
Verse 18
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ
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