Book 3 • Chapter 29
Section 29
30 verses
Verse 1
हा जग एक बीर रघुराया केहिं अपराध बिसारेहु दाया
Verse 2
आरति हरन सरन सुखदायक हा रघुकुल सरोज दिननायक
Verse 3
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा
Verse 4
बिबिध बिलाप करति बैदेही भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही
Verse 5
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा पुरोडास चह रासभ खावा
Verse 6
सीता कै बिलाप सुनि भारी भए चराचर जीव दुखारी
Verse 7
गीधराज सुनि आरत बानी रघुकुलतिलक नारि पहिचानी
Verse 8
अधम निसाचर लीन्हे जाई जिमि मलेछ बस कपिला गाई
Verse 9
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा करिहउँ जातुधान कर नासा
Verse 10
धावा क्रोधवंत खग कैसें छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे
Verse 11
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही निर्भय चलेसि न जानेहि मोही
Verse 12
आवत देखि कृतांत समाना फिरि दसकंधर कर अनुमाना
Verse 13
की मैनाक कि खगपति होई मम बल जान सहित पति सोई
Verse 14
जाना जरठ जटायू एहा मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा
Verse 15
सुनत गीध क्रोधातुर धावा कह सुनु रावन मोर सिखावा
Verse 16
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू नाहिं त अस होइहि बहुबाहू
Verse 17
राम रोष पावक अति घोरा होइहि सकल सलभ कुल तोरा
Verse 18
उतरु न देत दसानन जोधा तबहिं गीध धावा करि क्रोधा
Verse 19
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा सीतहि राखि गीध पुनि फिरा
Verse 20
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही दंड एक भइ मुरुछा तेही
Verse 21
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना काढ़ेसि परम कराल कृपाना
Verse 22
काटेसि पंख परा खग धरनी सुमिरि राम करि अदभुत करनी
Verse 23
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी चला उताइल त्रास न थोरी
Verse 24
करति बिलाप जाति नभ सीता ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता
Verse 25
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी
Verse 26
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ बन असोक महँ राखत भयऊ
Verse 27
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ
Verse 28
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ 29(क)
Verse 29
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम
Verse 30
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम 29(ख)
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