Book 3 • Chapter 36
Section 36
13 verses
Verse 1
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा पंचम भजन सो बेद प्रकासा
Verse 2
छठ दम सील बिरति बहु करमा निरत निरंतर सज्जन धरमा
Verse 3
सातवँ सम मोहि मय जग देखा मोतें संत अधिक करि लेखा
Verse 4
आठवँ जथालाभ संतोषा सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा
Verse 5
नवम सरल सब सन छलहीना मम भरोस हियँ हरष न दीना
Verse 6
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई नारि पुरुष सचराचर कोई
Verse 7
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें
Verse 8
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई
Verse 9
मम दरसन फल परम अनूपा जीव पाव निज सहज सरूपा
Verse 10
जनकसुता कइ सुधि भामिनी जानहि कहु करिबरगामिनी
Verse 11
पंपा सरहि जाहु रघुराई तहँ होइहि सुग्रीव मिताई
Verse 12
सो सब कहिहि देव रघुबीरा जानतहूँ पूछहु मतिधीरा
Verse 13
बार बार प्रभु पद सिरु नाई प्रेम सहित सब कथा सुनाई
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