Book 3 • Chapter 37
Section 37
14 verses
Verse 1
चले राम त्यागा बन सोऊ अतुलित बल नर केहरि दोऊ
Verse 2
बिरही इव प्रभु करत बिषादा कहत कथा अनेक संबादा
Verse 3
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा देखत केहि कर मन नहिं छोभा
Verse 4
नारि सहित सब खग मृग बृंदा मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा
Verse 5
हमहि देखि मृग निकर पराहीं मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं
Verse 6
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए कंचन मृग खोजन ए आए
Verse 7
संग लाइ करिनीं करि लेहीं मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं
Verse 8
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ
Verse 9
राखिअ नारि जदपि उर माहीं जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं
Verse 10
देखहु तात बसंत सुहावा प्रिया हीन मोहि भय उपजावा
Verse 11
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल
Verse 12
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल 37(क)
Verse 13
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात
Verse 14
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात 37(ख)
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